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| बी आर विप्लवी |
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| तृष्णा : आयल ऑन कैनवास |
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| घसिहारिने : आयल ऑन कैनवास |
उनके कई चित्रों में तो स्त्री-चरित्र अपनी पूरी मालिकाना ठसक के साथ चारपाई पर या मचिया पर बैठी हुक्म चलाते सी नज़र आत हैं जो हमारी पुरानी मात्री प्रधान जीवन परंपरा की याद दिलाते हैं। इन चित्रों में स्त्री आगे आने वाली पीढ़ी की बहू-बेटियों को किस प्रकार नैतिकता एवं आचरण का पाठ भी अपने कार्य व्यापार मैंन शरीक़ करके ही सिखाती हैं जिससे जिंदगी का व्यावहारिक ज्ञान हासिल हो सके।
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| बुकवा : आयल ऑन कैनवास |
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| पाहुन : आयल कैनवास पर : श्री शरद यादव के संग्रह में |
डा.लाल रत्नाकर
जैसा की सर्वविदित है कि कला जहां अभिव्यक्ति का स्रोत है वही कला जनमानस को सूचित और संप्रेषित भी करती है नाना प्रकार की सूचनाओं को और उसके माध्यम से बहुत सारी घटनाएं एवं उनकी जानकारी भी कराती है। जब एक कला किसी तरह से मौन हो जाती है तो दूसरी कला अपना काम करना आरंभ कर देती है अब जैसे इस वैश्विक महामारी में यकायक लाकडउन की घोषणा हो गई, जनजीवन ठप हो गया और पूरे देश में व्यवस्था के साथ खड़े होकर के अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया इस बीच व्यक्ति के पास अभिव्यक्ति और संप्रेषण के माध्यम सीमित हो गए सोशल मीडिया और सामान्य मीडिया में जो बातें होती रही हो उनमें एक तरह का विभेद और द्वंद हमारे सम्मुख उपस्थित हो गया ऐसे समय में कलाकार की भूमिका केवल एक भावनात्मक अभिव्यक्ति की भूमिका निभा कर शांत नहीं रह सकती। बल्कि वह ऐसे माहौल में अपनी जिम्मेदारी समझता है और अपनी तरह से सोचता है।
इस कलाकार में कैमरामैन भी हो सकता है पेंटर और इंटरव्यूर भी हो सकता है। और इन घटनाओं के साथ उसके अपने तादात में भी जुड़ते हैं यही कारण है कि उसकी रचना उसके सोच के साथ बढ़ती चली जाती है बहुत जरूरी है कि हम ऐसे में उन परिस्थितियों को जाने और उसके लिए उपयुक्त परिवेश तैयार करते हुए अपनी अभिरुचि का समावेश कैसे रोक सकते हैं और यही कारण है कि लंबे समय से मानव सभ्यता विभिन्न तरह की अभिव्यक्तिओ के मध्य अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है। हमने इस बीच और देखा है कि किस तरह से जिनके पास सिस्टम की चाबी है और वह किस तरह से उसका इस्तेमाल करते हैं।
इस बीच घटी घटनाओं पर यदि बात की जाएगी तो बहुत सारे लोग उससे अपनी असहमति दर्ज कर सकते हैं लेकिन जब भी वह विश्लेषण करेंगे तो पाएंगे कि जिस तरह से हमारी सरकारें जन सहयोग के लिए निरंतर अंधकार और आभासी एहसास कराती हैं वह यह कैसे नहीं जान पाती हैं कि व्यक्ति का जीवन चंद रुपयों में सुरक्षित हो जाएगा। हजारों हजार की संख्या में देश के विभिन्न हिस्सों में रह रहे कलाकार जिनको हम विविध रूपों में देख सकते हैं वह भवन निर्माण करता हो सकते हैं वह पेंटर हो सकते हैं वह कार्बर हो सकते हैं। वह बार्बर हो सकते हैं। लकड़ी का काम करने वाले लोग हो सकते हैं पत्थर काटने वाले लोग हो सकते हैं शिक्षा खींचने वाले लोग हो सकते हैं सिलाई करने वाले लोग हो सकते हैं या रंगाई करने वाले वस्त्रों की, घरों की या मिट्टी और हाथों से बनाने वाले तमाम तरह की कलात्मक उपादान जिनमें कटोरे कटोरे पंखे आदि आदि तमाम तरह के सामग्री के साथ साथ मशीनों की सहायता से काम करने वाले लोग जिनको आप किस नजर से देखेंगे।
केवल अपने घर में बैठ कर के कुछ कलाकृतियां तैयार कर लेना कला समझते हैं तो निश्चित तौर पर यह हमारी अज्ञानता और ए दूरदर्शिता ही है जिसमें केवल ललित कलाओं में उन्नत कलाओं को रख कर के देखा जाना ही आज कला नहीं है।
इसलिए हम यह कह सकते हैं कि लाकडाउन केवल उपयोगी कलाओं के लिए ही नहीं बल्कि हम जिन विद्यार्थियों को उन्नत कला की शिक्षा देते हैं उनके साथ भी अन्याय हुआ है और निश्चित तौर पर हम यह कह सकते हैं कि इन लगभग तीन महीनों में जो चीजें वह हासिल कर सकते थे वह अब अपने जीवन में दोबारा नहीं कर सकेंगे। इसलिए इस वैश्विक बीमारी करोना के कारण आर्थिक सांस्कृतिक सामाजिक कठिनाइयों के साथ-साथ अध्ययन अध्यापन की कठिनाई एक अपूरणीय क्षति है।
यहां मैं अपने कुछ चित्र आपको दिखाता हूं जो कोरोना के लाकडाउन के दौर में बनाए हैं :
महत्वपूर्ण यह है कि इस विमर्श में शरीक होकर के बहुत पुराने पुराने परिचितों को मिलने का मौका मिला और अपनी बात कहने का व्यापक प्लेटफार्म मिला जिस तरह से लोगों को मेरे चित्रों और मेरे वक्तव्य से सत्य और कर्म की पहचान हो रही थी सहज ही उसमें उनकी मनोभावना संदेश में निकल कर के आ रही थी।
संचालिका ने आधी आबादी के बारे में जब मुझे जोड़ते हुए संबोधित किया तो मेरा जो आशय था लॉकडाउन के मध्य मैंने जो चित्र बनाए थे वह पूरी आबादी के लिए फिर और पूरी आबादी के साथ एक कलाकार के रूप में मैंने अपनी बात रखी ना की आधी आबादी और उसकी समस्याओं को जिसको मैं अपनी कला में केंद्रित करता हूं।
हालांकि अन्य कला विद्वानों ने क्या महसूस किया होगा यह तो मैं नहीं जानता लेकिन मैंने अपने उत्तरदायित्व को बखूबी निर्वहन किया और समय की प्रासंगिकता को देखते हुए लॉकडाउन के मध्य में कैसी कला से सृजीत हो सकती है और कला विद्यार्थियों को क्या कष्ट झेलना पड़ रहा है उस पर अपनी बात ज्यादा फोकस किया क्योंकि वैश्विक महामारी निश्चित तौर पर देश में लंबे समय तक अपना पांव पसारे रखेगी ऐसा वैज्ञानिकों का मानना है और जब तक इस पर कोई कारगर इलाज आएगा तब तक ना जाने कितनी त्रासद घटनाएं घट चुकी होगी हमारी विरासत संभवत उन घटनाओं कितना सहेज पाएगी यह एक अलग सवाल है।
इसी तरह से मैंने कला प्राध्यापकों और विद्यार्थियों से निवेदन किया कि अगर देश का खाका आपके मन में है तो वह हमारे मनीषियों चिंतकों और समाज सुधारकों के आदर्शों पर चलकर के ही पूरा किया जा सकता है इसलिए मेरा मानना है कि अध्यापकों को अपने काम में ईमानदार होना चाहिए और विद्यार्थियों के प्रति दुर्व्यवहार और दुराचरण नहीं होना चाहिए।
मेरा आशय यहां दुराचरण से यह था कि जिस तरह की शिक्षा व्यवस्था आज चल रही है वह निश्चित तौर पर दुनिया के किसी भी मानदंड पर खरी नहीं उतरती।
इस मध्य मेरे अध्यापन का जो नुकसान हुआ है उसको मैंने देश के हर नुकसान से बड़ा नुकसान मान करके इस पूरे वैश्विक महामारी को अपने वक्तव्य में स्थान दिया है और जो मेरा लक्ष्य था वह इस महामारी ने पूरा नहीं होने दिया मैं उन विद्यार्थियों के प्रति जिन्हें मैंने भरोसा दिया था कि कम से कम इस सत्र की विद्यार्थी अपनी विधाओं में पूर्व की भांति पारंगत साबित होंगे ऐसा मेरा विश्वास है जो अधूरा रह गया।
आयोजकों को बधाई देते हुए उनका धन्यवाद ज्ञापन ज्ञापन करते हुए मैंने अपना वक्तव्य यहीं पर समाप्त किया था।
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अखिल भारतीय कला उत्सव गाजियाबाद-2013 के प्रायोजक आम्रपाली ग्रुप थे गा0 वि0 प्रा0 गाजियाबाद के तत्वाधान में इस कला उत्सव में निर्मित मूर्तियां एवं कलाकृतियां अपने तरह की एक अमूल्य निधि हैं।
पूरा आयोजन दिनांक.04 मार्च 2013 को प्रो0 राम गोपाल यादव सांसद व नेता संसदीय दल लोकसभा समाजवादी पार्टी के द्वारा समापन की रस्म को पूरा किए सम्पूर्ण कला उत्सव में निर्मित मूर्तियां एवं कलाकृतियांे का अवलोकन कर प्रो0 यादव ने इनकी प्रासांगिता पर बल देते हुए राष्ट््र के कोने कोने से आए हुए कलाकारों का आभार ज्ञापित किए कि वह अपने कौशल से इस शहर के लिए बेशकिमती कलाकृतियां तैयार कर रहे हैं यह शहर हमेशा इन्हें याद रखेगा। प्रो0 यादव ने उपाध्यक्ष, जिलाधिकारी, सचिव व समस्त गा0 वि0 प्रा0 गाजियाबाद के अधिकारियों की प्रशंसा करते हुए मुझे (लेखक) भी हिम्मत बधाई कि मैं अखिल भारतीय कला उत्सव गाजियाबाद के संयोजकत्व का दायित्व पूराकर पा रहा हूं। इस अवसर पर कलाप्रेमी नगरवासी, छात्र छात्राएं एवं समस्त कलाकार शामिल हुए। --------------------------------------
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सोमवार, 28 मार्च 2011
सृजनशीलता कभी भोथरी नहीं होती
संवाद
सृजनशीलता कभी भोथरी नहीं होती
सुप्रसिद्ध चित्रकार लाल रत्नाकर से आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत
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ग्रेजुएशन के लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और गोरखपुर विश्वविद्यालय में आवेदन दिया और दोनों जगह चयन भी हो गया. अंतत: गोरखपुर विश्वविद्यालय के चित्रकला विभाग में प्रवेश लिया और यहीं मिले कलागुरू श्री जितेन्द्र कुमार. सच कहें तो कला को जानने-समझने की शुरुवात यहीं से हुई. फिर कानपुर से बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कलाकुल पद्मश्री राय कृष्ण दास का सानिध्य, श्री आनन्द कृष्ण जी के निर्देशन में पूर्वी उत्तर प्रदेश की लोक कला पर शोध, फिर देश के अलग-अलग हिस्सों में कला प्रदर्शनियों का आयोजन...तो कला के विद्यार्थी के रुप में आज भी यह यात्रा जारी है. कला के विविध अछूते विषयों को जानने और उन पर काम करने की जो उर्जा मेरे अंदर बनी और बची हुई है, उनमें वह सब शामिल है, जिन्हें अपने बचपन में देखते हुए मैं इस संसार में दाखिल हुआ.
विकास की धारा विभिन्न रास्तों से गुजरती है. मानव मन की अभिव्यक्ति और यथार्थ की उपस्थिति दो स्थितियां हैं, जो समाज और कलाकार के मध्य निरंतर जूझते रहते हैं. ऐसे में समाज को फोटोग्राफी अक्सर उसके करीब नजर आती है. उसमें उसे तत्काल जो कुछ देखना है दिखाई दे जाता है. पल भर की मुस्कान, खुशी, दु:ख, दर्द के अलग अलग स्नैप संतोष देते होंगे, जिनको रंगो का ज्ञान, रेखाओं की समझ है, उन्हें कहां से फोटोग्राफी वह सब दे पायेगी.
इसलिए कलाकार की अर्न्तदृष्टि की उपस्थिति उसके चित्रों के माध्यम से होती है, जिसे उसने कालांतर में अंगीकृत किया होता है, विचार प्रक्रिया के तहत गुजरा हुआ होता है. ऐसे मे चित्रकार सहजतया अपने मौलिक रचना कर्म को तर्को की प्रक्रिया से गुज़ारता है, जिससे उसकी सृजनशीलता की विलक्षणता दृष्टिगोचर होती है. ऐसे में हम यह कह सकते है कि किसी भी प्रकार का आविष्कार या विकास जब भी किसी को अर्थहीन अथवा भोथरा साबित कर देता है तो यह प्रमाणित हो जाता है कि उसमें दम नहीं है. अन्यथा चित्रकार की अपनी धार होती है और अगर वह सृजनशील है तो वह कभी भोथरी हो ही नहीं सकती.
मुझे ऐसा लगता है कि स्त्री सृजन की सरलतम उपस्थिति के रूप में परिलक्षित होती रहती है. सौंदर्य और स्त्री एक-दूसरे के साथ उपस्थित होते हैं. ऐसे में सृजन की प्रक्रिया बाधित नहीं होती. मेरी स्त्रियां सीता नहीं हैं, कृष्ण की राधा नहीं हैं और न ही रानी लक्ष्मीबाई हैं. ये खेतों खलिहानों में अपने पुरूषों के साथ काम करने वाली स्त्रियां हैं.
उनका भी मन है, मन की गुनगुनाहट है, जो रचते है अद्भूद गीत, संगीत व चित्र जिन्हें लोक कह कर उपेक्षित कर दिया जाता है. उनका रचना संसार और उनकी संरचना मेरे चित्रों में कैसे उपस्थित रहे, यही प्रयास दिन-रात करता रहता हूं. मेरे ग्रामीण पृष्ठभूमि के होने मतलब यह नहीं है कि मैं किसी दूसरे विषय का वरण अपनी सृजन प्रक्रिया के लिये नहीं कर सकता था पर मेरे ग्रामीण परिवेश ने मुझे पकड़े रखा.
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इन सभी के कथा-संसार ने मेरी कला को समृध्द किया है. इनके पात्र मुझे आमंत्रित करते हैं. नि:संदेह कला और रचनात्मकता के नाना स्वरुप एक-दूसरे के लिए एक अवकाश की उपस्थिति तो देते ही हैं.
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कमोबेश पेंटिंग का भी यही हाल है. आए दिन समाचार पत्रों की सुर्खियां कला और कलाजगत के घाल-मेल को उजागर करती रहती हैं. कला में आज सामाजिक हलचल की जगह तिकड़मबाजी ने ले ली है. आज कला के बाजार में विविध प्रकार के द्वार खुल रहे हैं. जबकि कायदे से अभी तक चित्रकला की संभावनाओं पर बहस शुरु भी नहीं हुई है.
- डॉ.लाल रत्नाकर
इन्हीं में से निकलती नारी आज क्या सदियों से अपने कौशल और सयंम से समाज को अपने को सहेजते जिस शक्ति का परिचय दिया है यही कारण है की पुरुषों को पछाड़ विविध क्षेत्रों में अग्रणी रहने की अपनी जगह बनाई है, इसमे उन नारियों का भी मान बढ़ाया है जिसमे सदियों से सत्ता के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचने की उनकी इक्षा की पूर्ति हुयी है.
आज का समाज नारी को प्रयोग और प्रदर्शन की सामग्री ठीक उसी तरह से बना रखा है जैसे दलितों और पिछड़ों को, जहाँ जहाँ स्त्री अपने पराक्रम के बल पर आगे आने की बात करती हैं, उसको वहाँ बांटने के सारे हथकंडे अपनाये जाते हैं वह संसद, समाज या घर का सवाल हो.
डा.लाल रत्नाकर
उत्तरोत्तर नकारात्मक रवैये को यदि त्यागते हुए वैश्विक कला इतिहास पर दृष्टि डालें तो यह तथ्य करीने से प्रमाणित होते हैं कि धर्म समाज और राज्य कला विकास की प्रक्रिया को जितना प्रभावित करते हैं उससे कहीं ज्यादा रचनाकार का कौशल। विज्ञान, साहित्य एवं परम्पराएं जब जब धर्म और समाज के पक्ष और प्रतिपक्ष में आती हैं तो उदारता अनुदारता अनिवार्य रूप से कलाओं की रचनात्मकता को प्रभावित करती हैं। यहां शिक्षा का महत्वपूर्ण स्वरूप भी सहज ही सम्मुख आता है जब हम भारतीय शिक्षा व्यवस्था के इतिहास पर दृष्टि डालते हैं। इस अप्राकृतिक प्रक्रिया के चलते मौलिक प्रक्रिया के विस्तार की वजाय प्रतिरूपण और अलंकारिकता के वैभव का ही विस्तारित कला का स्वरूप ही अधिक प्रचलित हो पाया, यही कारण है कि कलाएं सामाजिक स्वरूप में स्वीकार्य तो रहीं पर उतनी विकसित न हो पाने का कारण कहीं न कहीं असमानता और मानसिक दिवालियेपन की कहानी कहती नजर आती हैं। यदि यह सब व्यवस्थित और उनमुक्त मौलिकता की स्थिति में होता तो भारतीय कला का गौरवशाली स्वरूप इतिहास के ही नहीं वर्तमान में भी दुनिया को दिशा देता।
इस परम्परा को आगे बढ़ाने और परवान चढ़ाने में जो कलाकार आगे आए उन्होने पीछे मुड़कर नहीं देखा, यथा कला के नये आयाम, नए प्रतिमान, नये मायने और नवीन तकनिकियों की खोजकर उनका भरपूर प्रयोग किए। यही कारण है कि समकालीन कला अपने विविध स्वरूपों में नजर आनी प्रारम्भ हुई। अब कला के मायने केवल और केवल पुरातन अर्थ समेटे रूपाकार न रहकर विविध अवस्थाओं व्यवस्थाओं को चिन्हित कर उनपर कलाकृतियों का सृजन हुआ। बृहत्तता और सूक्षमता का सामंजस्य एक साथ सामने आया, वसुदेव कुटुम्बकम की अवधारणा बलवती हुयी। चिन्तन की दिशा बदली, विषय बदले, माध्यम बदले। यही कारण है कि गुरू-शिष्य कहीं न कहीं मन्द पड़ी स्वतन्त्र विचारों का प्रसफुटन होना प्रारम्भ हुआ जिससे पारिवारिक परम्परा भी कमजोर हुई। यही कला कालान्तर में समकालीन कला के रूप में प्रतिस्थापित हुई और उसके कलाकारों ने समकालीन विचारों को लेकर विविध तकनीकियों का उपयोग कर एक नयी धारा की शुरूआत हुई है।
वर्तमान दौर का कलाकार उनसे दूर तो हुआ है परन्तु कलामूल्यों को लेकर नहीं, जबकि नयी पीढ़ी के दौर में रचना प्रक्रिया के तौर तरीकांे ने कई नये आयाम कला को दिए हैं जिनमें स्थान विशेष का जिक्र किया जाना उतना महत्व का नहीं है जितना उनकी प्रक्रियाओं का यह कार्य कमोवेश देश के हर हिस्से में हुआ है। जिनकी वजह से भारतीय कला ने अपनी उपस्थिति कायम की है। 
जिनका मतलब सीधे सीधे कलाओं को दयनीय बनाकर अपनी चेरी बनाना मात्र रह गया है। यही कारण है कि इस तरह के संस्थान कलाओं की वजाय कलाओं की अनुकृति कराने के केन्द्र मात्र बनकर रह गए हैं। यही नहीं अब तो इनकी यही व्यवस्था गुरूशिष्य की परम्परा बन गयी है। इनके उदाहरण हमें अनेक कला शिक्षकों के रोने धोने में दिखाई ही दे जाता है यथा आजकल के बच्चों के पास वक्त ही नहीं है क्लास में ही नहीं आते हैं, गांव के बच्चे न जिनके पास सामग्री होती है और न ही उन्हें समझ, उनके गार्जियन भी ऐसे हैं, इसलिए पाठ्यक्रम ऐसा रखिए जिससे काम आसानी से निकल जाए। और आश्चर्य जनक यथार्थ से रूबरू होना पड़ा है इस कला शिक्षा के जिम्मेदार शिक्षक होने का अरमान रखने के कारण। यहां उस यथार्थ की वानगी - स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के कल शिक्षण की आवश्यक सुविधाओं पर नजर डालें तो उनका कोई मानदण्ड लिखित रूप में कहीं उपलब्ध नहीं है, पर प्रयोगात्मक कक्षाओं की सामान्य व्यवस्था अनेक उन्नत कला महाविद्यालयों तक में उपलब्ध नहीं है जो अपने आप में एक बड़ी विडम्बना है।
यदि इनके विस्तार की बात की जाए तो उत्तरोत्तर उन प्रवृत्तियों को ही बढ़ावा मिल रहा है जिसमें कला मूल्यों एवं उनकी मौलिकताओं का अभाव है। इनके स्पष्ट कारण जो दिखाई दे रहे हैं उनमें कला की शिक्षण संस्थाएं, उपयुक्त संसाधन और निपुड़ ज्ञानदाताओं की अनुपलब्धता भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। इनसे भी महत्वपूर्ण यह है कि कलाकार बनने के लिए शिक्षा ग्रहण कर रहे शिक्षार्थी जो हैं वह या तो डिग्री के लिए अच्छे अंक पाने के लिए किसी न किसी प्रकार अपने कोर्स पूरे करते हैं। जबकि वे सब कलाकार के पाकर नौकरी के लिए। इसके विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि जितने कलाकार इन क्षेत्रों में दिखाई देने चाहिए थे वास्तविकता उनसे परे हैं। जो इस प्रकार के कलाकार हैं वह सतह पर कितने नजर आते हैं उन परिक्षेत्रों में जहां पर कला के ऐसे संस्थान हैं। अनेक कला महाविद्यालयों में इन स्थितियों से भिन्नता दिखाई तो देती है।
यही कारण है कि जिस स्थान पर कला को होना चाहिए था आज वहां नहीं है। इन्ही कारणों से आज की कला शिक्षा में जिन मूल्यों की प्रतिस्थापना होनी चाहिए थी कहीं न कहीं उनका संकट उपस्थित है। पर नित नए संस्थान जन्म ले रहे हैं जहां केवल और केवल यह हो रहा है कि शिक्षण प्रशिक्षण की कला का विकास तो हो रहा होगा पर कला के शिक्षण प्रशिक्षण की कला मूल्यों एवं उनकी मौलिकताओं का अभाव है यही कारण है कि सारी प्रक्रियाएं ठहरी हुयी सी प्रतीत हो रही हैं। हो सकता है कल कोई कला जिज्ञासु आए और इनको झकझोरने की कोशिस करे। फिर इनकी नींद टूटे और कला सृजन की संभावनाओं की भी इन्हे भी चिन्ता हो जो केवल और केवल नौकरियों वाली कला शिक्षा, उपाधियां उपलब्धियों की जगह ले ली हैं ।उनके चित्रों में भारतीय ग्रामीण परिवेश अपनी प्राचीन परम्परा के साथ ही साथ नवीन भाव भंगिमा में नज़र आता है। जो समाज के बहुसंख्यक वर्ग के अथक प्रयास के परिणामस्वरूप समस्त समाज के उत्तरोत्तर प्रगति का प्रतीक है। डॉ. लाल रत्नाकर भारतीय जीवन के पोर पोर में जड़ीभूत वर्ण-व्यवस्था वाली घृणित मान्यताओं के सम्बन्ध में उठे शाश्वत मानवीय प्रश्नों को अपने चित्रों के ज़रिए जीवंत करते रहते हैं।
यहां के विद्यार्थी इस प्रयोग से स्पेस में खूब विचरण करते थे उनका चित्र धरातल 4/9 का होता था। ऐसे बड़े स्पेस के सामने खड़ा होने पर बड़े-बड़े कलाकारों के भी हाथ पैर फूल जाते हैं। विभाग की दीवारों पर विद्यार्थियों से 10-10 फीट ऊंचे जो म्यूरल बनवाए वह अनोखा है। इसी के साथ रिलीफ म्यूरल में जब यहां के विद्यार्थी कार्य करते हैं तो किसी मान्य कला महाविद्यालय की याद ताजा हो जाती। विद्यार्थियों की रचना प्रक्रिया में किसी प्रकार की छूट नहीं थी। अनुशासन पालन के साथ रचनात्मक अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करते थे। यही कारण है कि जो विद्यार्थी यहां के इनके कलात्मक सख्त नियम का पालन करते वह टिक पाते और जो मौज-मस्ती व डिग्री मात्र के लिए आते उन्हें बीच में छोड़कर जाना पड़ जाता था। इनके समय में विभाग से बहुत सारे विद्यार्थी एक कलाकार के रूप में अपनी पहचान बनाने में सफल रहे। ऐसे ही विद्यार्थियों में मनोज बालियान, नेहा शबनम आदि प्रमुख हैं।
डॉ. रत्नाकर की कला-यात्रा महानगरीय सभ्यता में ग्रामीण संस्कृति की स्थापना की यात्रा है। विशेष रूप से ग्रामीण स्त्रियों की मनःस्थिति एवं मनोभावों को कैनवस पर उतारते हुए रत्नाकर जी ने चित्रकला की दुनिया में अपनी एक विशेष पहचान बनाई है। यह स्त्री-जीवन उनकी चित्रकला में निरंतर न केवल उपस्थित रहा है बल्कि गतिशील भी बना रहा है। वर्ष 1740 में बसे और 1976 में ज़िला बन जाने के बाद से ग़ाज़ियाबाद ने औद्योगिक विकास के साथ-साथ स्वयं को कंक्रीट के महानगर में तब्दील कर लिया है। लेकिन इस महानगर को सांस्कृतिक संस्पर्श देने का महत्वपूर्ण कार्य डॉ. लाल रत्नाकर की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। चाहे वह ’कला भवन’ की स्थापना हो और चाहे उसमें मूर्तिकारों के राष्ट्रीय स्तर की कार्यशालाओं के आयोजन हों, उन्होंने ग़ाज़ियाबाद को कला की दुनिया में हमेशा ऊॅंचा स्थान दिलाने का प्रयास किया है। ऐसी कार्यशालाओं से निकले हुए दर्जनों मूर्ति-शिल्प आज ग़ाज़ियाबाद के चौराहों एवं महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्थलों पर स्थापित हैं और शहर की कलात्मक अभिरुचि का प्रतीक बने हुए हैं।
कला, संस्कृति और शिक्षा की नगरी जौनपुर के विशुनपुर गाँव मे डॉ लाल रत्नाकर जी का जन्म हुआ। बचपन से ही चित्रकारी और पेंटिंग के प्रति रुझान रखने वाले लाल रत्नाकर जी ने फाइन आर्ट मे विधिवत अध्ययन और शोध कार्य करने के उपरांत जनवादी दृष्टिकोण से पूर्वांचल की लोक संस्कृति को कैनवस पर उकेरने का काम किया है। जौनपुर और पूर्वाञ्चल की लोककला को दुनिया के सामने लाने का महत्वपूर्ण कार्य डॉ लाल रत्नाकर जी ने किया है।
THE UNCOMMON PAINTER
We all know about Mr. R. K. Laxman's Common Man, but very few of us know about the uncommon man of Ghaziabad. He is Dr. Lal Ratnakar, the painter born on 12th August 1957 in a remote village of Jaunpur district ( UP ) near Varanasi.Like folk artists he too had started painting the fascinating motifs of birds, animals, trees and creepers on walls and doors of mud houses. But no folk artist has dared to do Ph. D. in folk art. This uncommon man has.
Naturally his
source of inspiration is rural India, especially women. He believes village
women are more transparent, more expressive than man. I believe Dr. Lal
Ratnakar's work too is expressive and poignant.
In his canvasses, you will find women with large doleful eyes and vacant gaze, in a situation where there is not a glimmer of hope. He has painted them with feelings and flair, deleting sentimentality. This is insider's view of rural India that also reveals the passion and fire behind every canvass. I mean more than a thousand art works the artist has made.
If one looks at them seriously, he will find that every painting wants to tell you something personal. May be about love, about a tragedy, or may be about the monsoon that has betrayed us all.
Dr. Lal Ratnakar's canvasses capture all these and much more with vibrant colors and unique division of space. For example, the lady in blue. This stylized work has 'frame within a frame' composition. It creates mystifying effect in the mind of onlooker, while bold combination of colors ( green and blue, purple and green ) makes other works too surprisingly beautiful to look at.
It is said that the most essential ingredients that make an artist great are :
A- Never ending urge to explore.
B- Tenacity of purpose.
C- One point agenda in life.
No wonder why Dr. Lal Ratnakar looks taller than his contemporaries.
AABID SURTI
11 OCT.
08
Cool,serene, blue,green, - Passionate, assertive, orange, red - It is
She - rural woman in many moods, colours shapes and faces - Ratnakar with his
bold and powerful drawings along with the vibrant colours have encapsuled the
glorious panoply that is Women, inhis own words "the true ambassodar of
our culture and traditions"
Simplicity personified, jovial Ratnakar is an utmost organized person -
Robust, swift, deft and definite when the painter in him is at the canvas and
calm, level headed, cool and organized when he administrates.
A painter close to my heart - I wish him success, wish to see him works
for years to come with the same energy and force.
Tarak Garai (sculptor)
15th Oct.2008.
लाल रत्नाकर जाने-माने कलाकार हैं। वे न सिर्फ उच्च कोटि के चित्रकार हैं बल्कि श्रेष्ठ मूर्तिकार भी हैं। उनसे मिलकर ही उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को समझा जा सकता है। उनके बनाए चित्रों में चटक रंगों और सीधी रेखाओं के प्रयोग से ग्रामीण जीवन और ग्रामीण स्त्रियों के विविध पहलुओं को बेहद खूबसूरती से व्यक्त किया गया है। गाय भी उनके चित्रों में अपने विविध अर्थों में दिखाई देती है। वे सामाजिक - राजनीतिक विषयों को भी इन्हीं प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त करते हैं । वे सच्चे अर्थ में लोक जीवन के अद्भुत चितेरे हैं ।इससे भी अधिक वह सच्चे और अच्छे इंसान हैं।
| बी आर विप्लवी |
कला के पारखी विद्वानों ने ललित कला को परिभाषित करते हुए कहा है कि सौन्दर्य या लालित्य के आश्रय से व्यक्त होने वाली कला, ललित कला है। इसे प्रकारांतर से समझा जाए तो यह आशय ध्वनित होता है कि, जो कला या कलाएं सौंदर्य या लालित्य के आश्रय से व्यक्त नहीं होतीं वह ललित कला नहीं हैं, अर्थात वे कोई अन्य कलाएं हो सकती हैं। तो फिर वह कौन सी कला है जो सौंदर्य या लालित्य का सहारा नहीं लेती या उसका प्राप्य अभीष्ट सौन्दर्य नहीं है? इस प्रश्न के उत्तर की तलाश में जीवन-जगत से जुड़े हुए तमाम तरह के प्राकृतिक एवं बनावटी उपज/उत्पाद और निर्मितियों को सामने रखने पर एक अलग तरह का भाव बोध एवं अवधारणा बनती है।
| चित्र ; संघर्ष-1 (एक्रेलिक ऑन कैनवास) |
| तृष्णा : आयल ऑन कैनवास |
| चित्र ; संघर्ष (एक्रेलिक ऑन कैनवास) |
विगत कई दशकों में भारतीय आधुनिक चित्रकला कई बदलावों के सहारे आज अमूर्त स्वरूप को ग्रहण करते नजर आती है ,जहां पर कला में भाव- उद्दीपन की क्षमता कम और कौशल के दांव-पेंच ज्यादा नजर आते हैं। ऐसे में यदि कोई कलाकार अपने राजनीतिक प्रतिबद्धता और सामाजिक सरोकारों के चलते मानवता व सामाजिक बराबरी को अपने चित्र कर्म का मुख्य ध्येय बना ले, तो मानो आज के परिवेश में कोई प्रेमचंद रंगों के मनोविज्ञान के सहारे सर्वहारा वर्ग की सामाजिक समानता के लिए नई इबारत लिख रहा हो ।हमारे समय महत्वपूर्ण चित्रकार अपर्णा कौर एक जगह लिखती हैं कि “प्रेमचंद ने जिस तरह अपने साहित्य में गांव को स्थापित किया है वही काम कला की दुनिया में उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से आने वाले चित्रकार एवं सामाजिक समरसता के पैरोकार डॉ.लाल रत्नाकर अपनी पेंटिंग के माध्यम से कर रहे हैं।“
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| लाल रत्नाकर द्वारा सभी चित्र |
मुम्बई की जहाँगीर आर्ट गैलरी काला घोड़ा में सुप्रसिद्ध चित्रकार डॉ लाल रत्नाकर ग़ाज़ियाबाद निवासी के चित्रों की प्रदर्शनी 8 मार्च से 13 मार्च तक लगी हुई है । मुझे प्रदर्शनी में आमंत्रित किया था डॉ रत्नाकर ने , जहाँ मेरे मित्र साहित्यकार राजेश प्रभाकर भी दिल्ली से पधारे हुए थे । मेरा प्रदर्शनी में डॉ रत्नाकर, उनके चित्रकार पत्र व राजेश भाई ने पुष्प गुच्छ अर्पित कर स्वागत किया । डॉ रत्नाकर ने मुझे प्रदर्शनी में लगाए चित्रों की यात्रा कराई और अपनी कलाकृतियों में निहित भावों और सोच से भी अवगत कराया ।
बहुत से कला प्रेमी लोग प्रदर्शनी में चित्रों का अवलोकन कर रहे थे । अचानक मेरी नज़र प्रदर्शनी में चित्रों का अवलोकन करते विश्व प्रसिद्ध डॉ प्रकाश कोठारी पर पड़ीं । डॉ कोठारी से मेरी मुलाक़ात सुप्रसिद्ध ग़ज़लकार सूर्य भानु गुप्त के कृतित्व व व्यक्तित्व पर पत्रिका चिंतन दिशा के विशेषांक के लोकार्पण के शुभ अवसर पर हुई थी जिसमें संपादक और मित्र हृदयेश मयंक के निमंत्रण पर मैं शिमला से आया था । वो एक बेहद शानदार आयोजन था जिसमें जावेद अख़्तर साहब, समीर अंजान , प्रहलाद निहलानी व कई बड़ी हस्तियों ने प्रतिभागिता दर्ज की थी । जावेद अख़्तर साहब, प्रेम जनमेजय व समीर अंजान से मेरी थोड़ी थोड़ी पहचान वहीं हुई थी । डॉ प्रकाश कोठारी ने अपने वक्तव्य में कई महत्वपूर्ण रहस्योद्घाटन किए थे जो मिलने पर मैंने उन्हें याद दिलाए । उन्होंने भी कुछ और जो बातें हुईं थीं हमें बताया । डॉ कोठारी और गजलकार सूर्य भानु गुप्त गहरे मित्र हैं । पर सूर्य भानु आजीवन कुंवारे रहे - आज भी । निहलानी साहेब ने चुटकी ली “ भाई तुम ( यानि गुप्त जी ) शाश्वत कुंवारे रहे तो तुम्हें कोठारी जैसे सुप्रसिद्ध सेक्सोलॉजिस्ट की क्या ज़रूरत रही “ सारी महफ़िल ठहाकों से गूंज उठी ।
हाँ , अब डा रत्नाकर की चित्रकारी की विशेषता पर मुझे देश की विश्व प्रसिद्ध चित्रकार अमृता शेरगिल की चित्रकारी का स्मरण हो आया । अमृता जी ने महिलाओं के ऊपर , उनकी विभिन्न समस्याओं व दुविधाओं को उजागर करती जीवंत चित्रकारी की थी । डॉ रत्नाकर की चित्रकारी भी महिला सशक्तीकरण की जीवंत अभिव्यक्ति करती कविताओं और ग़ज़लों की तरह हैं ।
डॉ रत्नाकर व राजेश भाई के आग्रह पर मैंने अपनी वो ग़ज़ल सुनायी जो शिमला छोड़ते समय मैंने गेयटी थियेटर में अपने विदाई समारोह में पढ़ी थी और जिसके मुख्य शेर को हिमाचल के सभी बड़े अख़बारों- दिव्य हिमाचल, अमर उजाला, दैनिक भास्कर व दैनिक जागरण आदि ने अंकित कर प्रकाशित किया था ।
प्रदर्शनी जीवंत और मेरी विज़िट बहुत सार्थक रहीं - मुझे निमंत्रण करने के लिए डॉ रत्नाकर व डॉ राजेश प्रभाकर का बहुत-बहुत आभार, शुक्रिया, अभिनंदन ।
विनोद प्रकाश गुप्ता
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